| Sansmaran |
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संस्मरण सरदार पटेल विद्यालय में मेरा दाखिला हुआ, मेरा नया स्कूल मुझे बहुत पसन्द आया, विद्यालय भवन का आकर्षण के साथ वहां के विद्यार्थियों की यूनिफार्म, प्ले ग्राउण्ड, स्कूल बस सब ने मन मोह लिया। बसें देखकर तो लगता कि हमारा घर स्कूल के इतने नजदीक क्यों है जहाँ से हम मात्र दो मिनिट में स्कूल पहुंच जाते हैं। मन बसों में सैर करने को मचलता ही रह जाता था। हमारे विद्यालय के अध्यापक हमारे व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थें, वे जिस भी क्षेत्र में जो विद्यार्थी अव्वल होते उन्हें वैसा ही प्रषिक्षण देते तथा प्रोत्साहित करते थे, जिससे विद्यार्थी अपनी योग्यता से अपने-अपने क्षेत्र में हासिल करें यह बात में तब भी महसूस करती थी। पहले ही वर्ष मैं खेल में अव्वल व पढ़ाई में मध्यम साबित हुई। हमारे खेल के टीचर स्व. डी.आर गुप्ता सर ने मुझे खेल में मेहनत करने के साथ-साथ पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया। मेरी हिन्दी की कक्षा अध्यापिका श्रीमती नांरग ने मुझे हिन्दी की कविता प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का मौका दिया। मैंने सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखित कविता ÷÷यह कदम का पेड़'' पढ़ी, मेरी प्रस्तुती पर मुझे पुरस्कार मिला। मेडम नारंग ने मुझे कहा- ÷÷महादेवी, तुम पढ़ाई में भी ध्यान दो और साहित्यकार महादेवी वर्मा जैसा नाम कमाओं।'' उस समय की सीख याद है मुझे, लेकिन जीवन में समय ने मेरा साथ नहीं दिया षिक्षा में मैं आगे नहीं बढ़ पाई। नारंग मैडम जो हमारे बीच नहीं है लेकिन उनका आषीर्वाद सदा हमारे साथ है उनसे क्षमा मांगते हुए उन्हें शत्-षत् नमन् करती हूँ। एक वर्ष कैसे बीता पता ही नहीं चल पाया। मैंने पाँचवी कक्षा में अपना कदम रखा। अब तक मैं और मेरे टीचर यह जान चुके थे कि मैं खेल में अच्छा प्रदर्षन कर सकती हूँ। शाम को रोज स्कूल ग्राउण्ड में अभ्यास करने लगी। श्री डी.आर गुप्ता मुझे जिमनास्टिक, मलखम्भ, ऊँची कूद, लम्बी कूद, १०० मीटर, २०० मीटर का अभ्यास करवाते, जिससे मैं चेम्पियनषिप में भाग ले सकू। मेरी खेल टीचर श्रीमती सिक्का भी मुझे प्रेरित करती। हमारे अध्यापकों का सहयोग और मेरी मेहनत रंग लाई और मैं पांचवी में जूनियर चैम्पियन बनी। खुषी की बात थी खेल में मन रम गया और पढ़ाई में पिछड़ गया, नतिजा मैं उस वर्ष अपने साथियों से पिछड़ गई। पुनः जब पुरानी कक्षा में जाना हुआ अजीब सी स्थिति हो गई, सब की आंखों में सवाल के साथ कौतुहल भी था कि यह हर क्षेत्र में अव्वल आने वाली लड़की फेल हो गई मुझे भी ग्लानि का आभास हुआ। गुप्ता सर के हौसला अफजाई ने मुझे सम्बल दिया तथा मैंने भी कमर कस ली कि अब पढ़ाई में भी अव्वल आना है। धीरे-धीरे नये सहपाठियों से मेल मिलाप बढ़ा, दूसरे सेक्षन के छात्र-छात्राओं से सम्पर्क हुआ और उनमें से कई ग्राउण्ड पर अभ्यास साथ ही करते। विद्युत दोस्ती हो गई जो आज भी कायम है। श्री एन.एम. भाटिया सर हमारे क्लास टीचर थे गणित में सल्पिमेन्टी आई, सर ने बाऊजी को बुलाने को कहा सांसद सदस्य थे तो हर बार बहाना लगा देते कि दिल्ली से बहार है सर ने षिकायत घर पर बाऊजी से बड़ी बहन द्वारा कर दी। मुझे घर पर खूब डांट पड़ी। मन तरह-तरह से परेषान करता, सर ने घर पर षिकायत करके ठीक नहीं किया। सर के घर का जुगाड़ करके फोन नम्बर प्राप्त किया और उनकी बहन से बातें करना शुरू कर दी। एक दिन हिम्मत करके आर.के. पुरम जाने वाली बस न. ८०६ में बैठकर अकेली उनके घर जा पहुँची। सर की बीजी व बड़े भाई से मुलाकात हुई। बीजी ने स्नेह से पूछा - ÷÷कैसी आई हो'' ÷÷मिलने चली आई,'' कहकर मैं चुप हिम्मत जबाब देने लगी। उपर से डर भी लग रहा था कि कही सर घर पर न आ जाये। ÷÷कोई बात है, कुछ कहना है'' बीजी ने पुनः पूछा, अनुभवी आंखे झट ताड़ गई कि बित्ते भर की लड़की बिना किसी मकसद के अकेली नहीं आती। ÷÷आप ५ ५ ५ सर को डांटती हो ........'' डरते-डरते पूछा। बीजी हंस दी। ÷÷तुम्हें वह डांटता है क्या ?'' सर के बड़े भैया ने पूछा। मैंने सारी घटना उगल दी, मेरे बाबूजी से षिकायत की यह भी बता दिया। मुझपर ही हमेषा नाराज होते हैं किसी और को इतना नहीं डांटते पूरी बात बताकर मैं हल्की हो गई थी। ÷÷अच्छा तो ये बात है, आज आने दो मैं उसे डांटूगी, लेकिन बेटा, तुम्हें भी मन लगा कर पढ़ना चाहिए।'' बीजी ने सर पर हाथ फेरते हुए आष्वस्त किया। मैं वापस आ गई पर साथ में एक नया परिवार लेकर, आज भी मैं गुरू माता के परिवार की सदस्य हूँ। हमारे स्कूल के प्रिन्सिपल रधुभाई सर की ऐसी छबि है कि उन्होंने विद्यार्थियों व टीचर में समरूपता रखने का प्रयास किया और विद्यालय में आने वाला हर परिवार विद्यालय का सदस्य बन जाता। हमारे स्कूल परिसर में शहतूत के पेड़ लगे हैं, जिनपर चढ़कर मै रोज ही शहतूत का आनन्द उठाती। मधुबेन के घर के सामने अंगूर की बेल थी जिसमें से मैं कच्चे अंगूर तोड़ा करती थी। छीपकर अंगूर तोड़ने का मजा ही कुछ और था, लेकिन वे अक्सर मुझे पकड़ लेती और एक दिन तंग आकर उन्होंने मेरे घर षिकायत की धमकी दे डाली। मैंने बहुत हाथ पैर जोड़े, मनाया लेकिन सब बेकार, वे घर पहुंच गई, घर पर भी नौकर से कहलवा दिया कि बाऊजी घर पर नहीं है, अम्मा सो रही है लेकिन मधुबेन नहीं मानी और उस दिन सारे शहतूत और अंगूर खट्टे हो गये। उनके जाने के बाद जबरदस्त डांट पड़ी, उनके घर की तरफ जाना बंद कर दिया। उनका बेटा जिसे अप्पू कहते थें मुझे दिखता तो घूरती रहती मानों अब षिकार अप्पू बनेगा। लेकिन जब मधुबेन मेडम ने मुझे पाठक सर से कहकर बुलवाया तो मेरा क्रोध थोड़ा नरम पड़ा, मिलने गई, मधुबेन मनाने में लगी थी, ÷÷महादेवी, तेरे लिए ढ़ोकले बनाये है, चख कर देख कैसे बने हैं।'' मन तो बहुत कर आया पर नाराजगी भी जतानी थी इसलिए थोड़ी न नुकार करती रही और फिर मान गई। फिर क्या था शहतूत वे तुड़वाकर रखती, लेकिन उन शहतूतों में वह स्वाद नहीं था जो मधुबेन की नजरे बचाकर तोड़कर खाने में आता था। यादे है जी, जो चलचित्र सी मानस पटल पर उतर आई है। उस वर्ष मुझे गणित में ९६ नम्बर मिले, गुप्ता सर तो खुष थे ही सभी टीचर प्रसन्न, उन्हें लगा था कि महादेवी अब अपनी सही रफ्तार पर आई है। भाटिया सर ने कहा कि महादेवी का पेपर मैंने कई बार चेक किया मुझे आश्चर्य हो रहा था। प्रिन्सिपल रधुभाई की जगह नई प्रिन्सिपल वी पार्थासाथी आई। मुझे एक दिन किसी बात पर सजा मिली। डी.आर. गुप्ता सर ने ऑफिस के बाहर बेन्च रखकर उसपर दो पिरियेड तक खड़ा रखा, आते जाते टीचर को मैं दया भाव से देखती कि शायद वे मुझे बचा ले लेकिन किसी ने नहीं बचाया, उल्टे प्रिन्सिपल मेडम ने बुलाया और खूब डाल लगाई। प्रिन्सिपाल मेडम की डांट ने मन में बदला लेने का ख्याल जागा और ऑफिस के बाहर खड़ी उनकी गाड़ी की तरफ सतर्कता से बढ़ी, बालों में लगी पिन निकाली टायर की नाब पर पीन लगा ही रही थी कि पीछे से आवाज आई ÷÷महादेवी क्या हो रहा है कक्षा में जाओं'' पीछे पलटकर देखा तो डी.आर. गुप्ता सर थे। चुपचाप सीढ़ी चढ़ने लगी सामने से प्रिन्सिपल मेडम का बेटा जो छोटा ही था चला आ रहा था मैंने सारा गुस्सा उस नन्हें के गाल पर थप्पड़ मारकर उतारा। वह जोर-जोर से रोने लगा। एन.एम. भाटिया सर ने मुझे देखा और मैं भाग गई। मेरी शरारते और मेरी शैतानियां मुझे आज भी कभी हैरान तो कभी होठों पर मुस्कान दे जाती है। गर्मी की छुट्टीयों में स्कूल में दो घन्टे की क्लास लगा करती थी जो विद्यार्थी जिस विषय में कमजोर है वह आकर अपनी पढ़ाई करते थे। लायब्रेरी भी छुट्टीयों में खुली रहती है। हमारे विद्यालय की एक खासियत थी कि वहां झूठ को कोई जगह नहीं थी। सच पर डटे रहें और आगे बढ़ों यह उस समय का नारा था। उसी की मिसाल है कि आज उस स्कूल का जो भी विद्यार्थी जहां भी कार्यरत है एक दूसरे से मिलने पर वही अपनापन लिए रहते है। हौसला अफजाई और मदद् करना यह गुण तो हमें विद्यालय ने हमारे बचपन में ही हमें दे दिया था। उस विद्यालय की कमी आज जीवन में खलती है लेकिन उसके संस्कार हमारे साथ है। एक वाक्या याद आ रहा है यह बात सन् १९८१ की है मैं भोपाल स्टेषन पर अपने पति को छोड़ने गई थी, वहां दो तीन पुरूष मुझसे कुछ दूरी पर खड़े बातें कर रहे थे। उनमें से एक मुझे बार-बार देख रहे थें, मेरा रूप बदला हुआ था साड़ी पहने मैं सर पर आंचल लिए हुए थी। तभी उनमें से एक मुझे बुलाने आया। कहा कि ÷÷सर आपको बुला रहे है।'' मैं उनके नजदीक पहुंचते-पहुंचते पहचान गई कि वह सर कौन है मेरे मुंह से निकला - ÷÷कारत........ भाई'' वे मुस्कुरा दिये। ÷÷आपने मुझे पहचान लिया......÷÷ मैंने आष्चर्य से पूछा। ÷÷कैसे नहीं पहचानता, सरदार पटेल विद्यालय की छात्रा हो, और तुम महादेवी शर्मा हो , एक नाटक में तुम हिरण बनी थी, अरे हॉं तुम तो मलखम्भ भी करती थी।'' कारन्त भाई ने कहा। मेरी खुषी का ठीकाना न रहा, हमारे विद्यालय से जुड़े जो भी लोग थे वे एक दूसरे को याद रखते थे। हमारे विद्यालय के साथियों में डॉ. अभय शर्मा न्योरोसर्जन है, वरून बडोला अभिनेता है, सुधीर पाण्डे आटिस्ट हेमा सहाय मंजरी सहाय..................................... थे सब हमारे साथी है। जिनमें प्यार की भावना पलती बढ़ती रहती है। हम समय का इस्तेमाल करके एक दूसरे का सम्बल बनते है इस युग में यह ही सच्ची दोस्ती है। मैं अपने सहपाठी ब्रजेन्द्र अग्रवाल की तहदिल से शुक्रगुजार हूँ जिसने मुझे प्रेरित किया कि मैं अपना सस्मरण लिख कर भेजू। हमारे गुरूजनों से मैं विनम्र नमन् करते हुए अपनी उन तमाम गलतियों का जिन्हें जान बूझकर या अनजाने में मुझसे हुई और जिनसे उन्हें मेरे द्वारा ठेस पहुँची है तो मैं आज आप सभी से क्षमा मांगती हूँ। मेरा १९८० का बैच का सिल्वर जुबली महोत्सव में भाग नहीं ले पाई थी लेकिन मेरे सहपाठियों को मैं आज भी याद हूँ। उन्होंने उस समय प्रकाषित पत्रिका सहरीदया भेजी है मैं उनकी कृतज्ञ हूँ। आखिर में मैं अपने विद्यालय के प्रिन्सपल टीचर जिन्हें मैं जानती हूँ और जिन्हें नहीं जानती हूं सभी को नमन् करती हूं। मेरे विद्यालय के हर कर्मचारी को वन्दन जिन्होंने हमारे विद्यालय को सुव्यवस्थित रखा। माली जिन्होंने विद्यालय परिसर रंग बिरंगे फूलों से सजाये रखा। कैन्टीन जिसमें हमें ताजा व स्वादिष्ट नाष्ता मिला। सफाई कर्मचारी जिन्होंने विद्यालय स्वच्छ रखा, बस ड्रायवर जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई। इन सभी कि मेहनत, ईमानदारी, व निष्ठा से हमारे सरदार पटेल विद्यालय की शोभा विष्मरणिय है। हमारे षिक्षक आज जो हमारे बीच नहीं है उनका आषीर्वाद आज भी विद्यालय के प्रत्येक छात्र पर बना हुआ है, उन महान आत्माओं को नमन् करते हुए मैं अपने विद्यालय को शत्-षत् नमन् करती हूँ। मेरी मधुर यादें जिन्हें मैं अपने सात्विक मन से आपके समक्ष रख रही हूँ। पूर्व छात्रा महोदवी शर्मा १९८०
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