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सरदार पटेल विद्यालय के मित्रों के लिये..‘छोड़ पेड़ की छांव...’निकल पड़े थे....हम सभीतीस साल पहले--ज़िन्दगी की उंगली थामअपने-अपने सपने तलाशने.. तराशने।सफ़र की गुड़ीमुड़ी–उलझीं राहों को सुलझातेक़दम बढ़ते गये मन्ज़िल की ओर।राह में कितने चेहरे मिले.. कुछ अपने बने-- साथ चले.. कुछ बिछड़े....छूट गये....कुछ टूट गयेक़दम बढ़ते गये..... अथक, निरन्तर, अविरामकभी धूप ने तपाया तो कभी मिला चांदनी का साया जिन्दगी कभी फूलतो कभी धूलआज फिर क़तरा-क़तरा छांवमुझे घेरने लगी हैआज फिर कुछ चेहरे उफ़क़ पर उभर आये हैंअपने से.... मगर पराये.अपने से?पराये? |